प्रातःकाल वंदना

कराग्रे वसते लक्ष्मी:, करमध्ये सरस्वती।
कर मूले तु गोविन्द:, प्रभाते करदर्शनम॥ १॥
समुद्रवसने देवि, पर्वतस्तनमंड्ले।
विष्णुपत्नि, नमस्तुभ्यं पाद्स्पर्श्म क्षमस्वे॥ २॥

भावार्थ:
हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती तथा मूल में गोविन्द (परमात्मा ) का वास होता है। प्रातः काल में (पुरुषार्थ के प्रतीक) हाथों का दर्शन करें॥१॥
समुद्ररूपी वस्त्रोवाली, पर्वतरूपी स्तनवाली और विष्णु भगवान की पत्नी हे पृथ्वी देवी ! तुम्हे नमस्कार करता हूँ ! तुम्हे मेरे पैरों का स्पर्श होता है इसलिए क्षमायाचना करता हूँ॥ २॥

Manish Mundra
Manish Mundra
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