तिलक भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। प्राचीन काल से ही लोग अपनी परंपराओं के अनुसार अपने ललाट पर तिलक धारण करते आ रहे हैं। आदि काल से ही राजगुरु समय और कार्य के अनुसार राजा का राजतिलक करते थे। युद्ध के समय प्रस्थान करते समय पत्नियां पतियों के ललाट पर तिलक लगाती थीं। किसी भी मंदिर में जाने पर पुजारी दर्शनार्थियों के ललाट पर तिलक लगाते हैं। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के समापन पर पुरोहित सभी उपस्थित लोगों को तिलक लगाते हैं। श्राद्ध कर्म करते समय भी तिलक लगाया जाता है। रक्षाबंधन, नागपंचमी और भैयादूज के अवसर पर बहनें अपने भाइयों के मस्तक के अग्रभाग पर तिलक लगाकर उनके लिए मंगलकामना करती हैं। सिंदूर, कुमकुम आदि की बिंदी सौभाग्यवती होने का चिन्ह है। सकुशल यात्रा की कामना के लिए, प्रतियोगी परीक्षा में सफलता के लिए, स्वागत-सत्कार करने के लिए भी प्राचीन काल से तिलक लगाने की शानदार परंपरा रही है। वैदिक संस्कृति के अंतर्गत तिलक को पवित्र तथा शुभ चिन्ह कहा जाता है।
स्नानं दानं तपो होमो देवतापितृ कृम्र्म च।
तत्सर्व निषफलं याति ललाटे तिलकं बिना।
ब्राह्मणस्तिल्कं कृत्वा कुय्र्यासंध्याच्च तर्पणम्।।
अर्थात : तिलक के बिना स्नान, हवन, जप, तप व देवकार्य आदि सभी कार्य फल विहीन हो जाते हैं। ब्राह्मण को चाहिए कि तिलक धारण करने के पश्चात ही तर्पण आदि कार्य करें।
ललाट पर तिलक लगाने से आत्मबल में बढ़ोतरी
ललाट पर तिलक लगाने से आत्मबल में बढ़ोतरी होती है।
हिन्दू धर्म ग्रंथों और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि तिलक धारण किया जाता है तो सभी पाप नष्ट हो जाते है। सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं। ललाट अर्थात माथे पर भस्म या चंदन से तीन रेखाएं बनाई जाती हैं उसे त्रिपुंड कहते हैं। भस्म या चंदन को हाथों की बीच की तीन अंगुलियों से लेकर सावधानीपूर्वक माथे पर तीन तिरछी रेखाओं जैसा आकार दिया जाता है। शैव संप्रदाय के लोग इसे धारण करते हैं। यह बात अब केवल धर्म ग्रंथों या विश्वास की नहीं रही बल्कि आधुनिक विज्ञान भी इसके फायदों को मानने लगा है।
तिलक लगाने के लाभ
तिलक करने से व्यक्तित्व प्रभावशाली हो जाता है। दरअसल, तिलक लगाने का मनोवैज्ञानिक असर होता है, क्योंकि इससे व्यक्ति के आत्मविश्वास और आत्मबल में भरपूर इजाफा होता है। ललाट पर नियमित रूप से तिलक लगाने से मस्तक में तरावट आती है. लोग शांति व सुकून अनुभव करते हैं साथ ही यह कई तरह की मानसिक बीमारियों से बचाता है। विज्ञान की मानें तो तिलक से दिमाग में सेराटोनिन और बीटा एंडोर्फिन का स्राव संतुलित तरीके से होता है, जिससे उदासी दूर होती है और मन में उत्साह जागता है. यह उत्साह लोगों को अच्छे कामों में लगाता है। इससे सिरदर्द की समस्या में कमी आती है। हल्दी से युक्त तिलक लगाने से त्वचा शुद्ध होती है. हल्दी में एंटी बैक्ट्रीरियल तत्व होते हैं, जो रोगों से मुक्त करता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, चंदन का तिलक लगाने से मनुष्य के पापों का नाश होता है. लोग कई तरह के संकट से बच जाते हैं. ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, तिलक लगाने से ग्रहों की भी शांति होती है। चंदन का तिलक लगाने वाले का घर अन्न-धन से भरा रहता है और सौभाग्य में बढ़ोतरी के साथ निर्भयता रहती है।
तिलक लगाने के लिए प्राचीन काल से ही नाना प्रकार की सामग्री प्रयोग की जा रही है। सिंदूर, मधु, हवन कुंड की भस्म, गोबर, गाय के चरणों की धूल या मिट्टी, घी, दही, गोरोचन, कस्तूरी, जल तथा मिट्टी सभी पवित्र नदियों, सरोवरों तथा तीर्थ स्थलों का जल तथा मिट्टी, गोपीचंदन, यज्ञकाष्ठ, बिल्व, पीपल तथा तुलसी के पौधे की जड़ के पास की मिट्टी महानिम्ब तुलसी की काष्ठ, अंजीर, गंधकाष्ठ, सफेद चंदन, लाल चंदन, आंवला, कुमकुम, कामिया सिंदूर, हल्दी, काली हल्दी तथा अष्टगंध आदि। पूजा-अर्चना आदि कार्यों में उपरोक्त सामग्री से तिलक लगाया जाता है।
भगवान शिव के भक्त शैवों तथा देवियों के आराधक शाक्तों के लिए भस्म ही तिलक की मुख्य सामग्री है। देवियों को कुमकुम तथा लाल चंदन से तथा पितरों को सफेद चंदन से तिलक लगाया जाता है। सूर्य, हनुमान तथा शक्ति की प्रतीक देवियों, काली, तारा व दुर्गा को लाल चंदन से तिलक लगाया जाता है।
देवी-देवताओं को अनामिका उंगली द्वारा, स्वयं को मध्यमा उंगली द्वारा, पितृगणों को तर्जनी उंगली द्वारा तथा ब्राह्मण आदि को अंगूठे द्वारा तिलक लगाया जाता है। यह विधि प्राय: प्रयोग में लाई जाती है।
शरीर पर शुभ चिन्हों को बनाने के लिए कुछ लोग बहुधा लकड़ी तथा धातु से निर्मित छापे का प्रयोग करते हैं। कभी-कभी लोग स्थायी चिह्न अंकित कर लेते हैं। ये शास्त्र विरुद्ध हैं।
तिलक सदैव बैठकर ही लगाना चाहिए। ललाट के दाहिने भाग में श्री ब्रह्मा, वामपाश्र्व में शिवजी तथा मध्य भाग में श्रीकृष्ण वास करते हैं, इसलिए मध्य का अंश खाली रखना चाहिए जिससे ललाट पर श्री विष्णु जी का वास बना रहे। आराध्य पर चढ़ाने से बचे हुए चंदन से ही तिलक लगाना चाहिए।
इस मंत्र का जप करके लगाएं तिलक, पूजन में तिलक लगाना जरूरी
वैसे तो आम तौर पर श्रद्धालू पूजन के समय तिलक जरूर धारण करते हैं, लेकिन आज के दौड़भाग के युग में बिना तिलक लगाए भी पूजा करने लगे है, जो कि किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह धर्म संगत नहीं है।
यदि पूजा का पूर्णफल आप चाहते हैं तो तिलक अवश्य लगाना चाहिए, बिना तिलक लगाए पूजन करने से पूर्णफल की प्राप्ति सम्भव नहीं है, इसलिए धर्म शास्त्रों में तिलक के महत्व को महिमा मंडित किया गया है, इसलिए सभी श्रद्धालुओं को भावयुक्त होकर तिलक धारण करना चाहिए, इससे पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। तिलक लगाने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं। तिलक लगाकर भोजन ग्रहण करने को धर्म शास्त्रों में धर्म संगत बताया गया है। यही वजह है कि मंदिरों में तिलक लगाया जाता है, ताकि भक्त को उसके दर्शन का पूर्ण फल की प्राप्ति हो सके और वह उनकी कृपा मनोवांछित फल प्राप्त कर सके।
किसी देवी-देवता के मंत्र के जप को आरम्भ करने से पहले हवन पूजन के समय रोली या चंदन का तिलक आवश्य लगाना चाहिए। वैसे तो हिंदू धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि नित्य क्रिया से निवृत्त क्रिया से निवृत्त होकर स्नान के बाद तिलक लगाना चाहिए, इसके बाद देवी- देवताओं का पूजन करना चाहिए।
इसके बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। बिना तिलक लगाए भोजन भी नहीं करना चाहिए। बिना तिलक लगाए भोजन करने को भी धर्म शास्त्रों ने निंदित माना है लेकिन आज के दौर में यदि इतना समय नहीं तो भी मंत्र जप करते समय आवश्य तिलक आवश्य लगाएं।
मंत्र है-
केशवानन्द गोविन्द वाराह पुरुषोत्तम।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं मे प्रसीदतु।।
कान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम्।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम्।।
तिलक लगाने की वैदिक परम्परा का पालन सनातन धर्मी अनंतकाल से करते आ रहे हैं। पूजन-अर्चन में तिलक का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि बिना तिलक के पूजन-अर्चन सफल नहीं होता है। यह परम्परा सृष्टि के आरम्भ से चली आ रही है। वैज्ञानिक तर्क यह है कि दोनों आंखों के बीच में आज्ञा चक्र होता है। इसी चक्र स्थान पर तिलक लगाया जाता है। इस चक्र पर तिलक लगाने से हमारी एकाग्रता बढ़ती है। तिलक लगाते समय उंगली या अंगूठे का जो दबाव बनता है, उससे माथे तक जाने वाली नसों का रक्त संचार व्यवस्थित होता है। रक्त कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं। विशेषकर कुमकुम, चंदन, मिट्टी, हल्दी, भस्म आदि का तिलक लाने का विधान है, जिनसे तिलक धारण करने की परम्परा सनातनकाल से चली आ रही है।
माथे पर तिलक लगाना मानसिक शांति प्रदान करता है। चंदन का तिलक लगाने से मानसिक उत्तेजना शांत रहती है। मन पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पुरुष को चंदन व स्त्री को कुमकुम भाल में लगाना मंगल कारक होता है। श्वेत चंदन, लाल चंदन, कुमकुम, विल्वपत्र, भस्म, आदि का तिलक करना शुभ है।
तिलक का वास्तविक अर्थ है , पूजा के बाद माथे पर लगाया जाने वाला चिन्ह। शास्त्रानुसार यदि द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) तिलक नहीं लगाते हैं तो वे चाण्डाल हैं। तिलक हमेंशा दोनों भौहों के बीच “आज्ञाचक्र” पर भ्रुकुटी पर किया जाता है। इसे चेतना केंद्र भी कहते हैं।
पर्वताग्रे नदीतीरे रामक्षेत्रे विशेषतः।
सिन्धुतिरे च वल्मिके तुलसीमूलमाश्रीताः॥
मृदएतास्तु संपाद्या वर्जयेदन्यमृत्तिका।
द्वारवत्युद्भवाद्गोपी चंदनादुर्धपुण्ड्रकम्॥
भावार्थ- चंदन हमेशा पर्वत के नोक का, नदी तट की मिट्टी का, पुण्य तीर्थ का, सिंधु नदी के तट का, चिंटी की बाँबी व तुलसी के मूल की मिट्टी का या चंदन वही उत्तम चंदन है। तिलक हमेंशा चंदन या कुमकुम का ही करना चाहिए। कुमकुम हल्दी से बना हो तो उत्तम होता हैं।
मान्यता है कि तिलक स्थान पर धन्नजय प्राण का रहता है। उसको जागृत करने तिलक लगाना ही चाहीए। जो हमें आध्यात्मिक मार्ग की ओर बढाता है।
तिलक चार तरह के होते हैं-
1- कुमकुम
2- केशर
3- चंदन
4- भस्म
– कुमकुम हल्दी चुना मिलकर बना होता है जो हमारे आज्ञा चक्र की शुद्धि करते हुए उसे केल्शियम देते हुए ज्ञान चक्र को प्रज्व्व्लित करता है।
– केशर जिसका मस्तिष्क शीतल होता है, उसको केसर का तिलक प्रज्ज्वलित करता है।
– चंदन” दिमाग को शीतलता प्रदान करते हुए मानसिक शान्ति भी देता है।
– “भस्मी” वैराग्य की अग्रसर करते हुए मस्तष्क के रोम कूपों के विषाणुओं को भी नष्ट करता है।
तिलक का महत्व
– जो भी व्यक्ति बिना तिलक लगाए भोर या संध्या का हवन करता है उसे इसका फल नहीं प्राप्त होता।
– ज्योतिष के अनुसार यदि तिलक धारण किया जाता है तो सभी पाप नष्ट हो जाते है सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं।
– चंदन का तिलक लगाने से पापों का नाश होता है, व्यक्ति संकटों से बचता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है, ज्ञानतंतु संयमित व सक्रिय रहते हैं। यदि वार अनुसार तिलक धारण किया जाए तो उक्त वार से संबंधित ग्रहों को शुभ फल देने वाला बनाया जा सकता है।
देवी-देवताओं के माथे पर न लगाएं सिंदूर
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कभी देवी-देवताओं के माथे पर सिंदूर नहीं लगाना चाहिए। यह गर्म प्रकृति का होता है।
उत्तर की ओर मुख करके लगाये तिलक
महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस व्यक्ति को तिलक लगाया जाता है, उसका मुख उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
12 स्थानों पर तिलक लगाने का है विधान
शास्त्रों में कहा गया है कि 12 जगहों पर तिलक लगाये जाने का विधान है।हृदय, दोनों बाजू, नाभि, पीठ, दोनों बगल, सिर, मस्तक, गले आदि मिलाकर शरीर के कुल 12 स्थानों पर तिलक लगाने का विधान है।
चंदन का तिलक रखता हैं दिमाग शांत
चंदन का तिलक अपने माथे पर लगाने से दिमाग में सेराटोनिन और बीटा एंडोर्फिन का स्राव संतुलित तरीके से होता है, जिससे मनुष्य उदासी दूर होती है और मन में उत्साह रहता है। यही उत्साह कर्म में सकारात्मकता लाता है।
कितने हैं तिलक के मत
तिलक मात्र एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने पंथ है, संप्रदाय हैं, उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं। सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं।
शैव- शैव परंपरा में ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है।
1- शाक्त- शाक्त सिदूर का तिलक लगाते हैं। सिदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति व तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
2- वैष्णव– वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- लालश्री तिलक-इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुमकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है।
3- श्यामश्री तिलक- इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है।
4- विष्णुस्वामी तिलक- यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भोहों के बीच तक आता है।
5- रामानंद तिलक- विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है।
6- अन्य तिलक- गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। कई साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।
चरणों से सिंदूर लगाने के लाभ
जब भी हम मंदिर जाते हैं तो श्रीराम भक्त हनुमान व देवी आदि के चरणों से सिदूर लेकर माथे पर लगाते हैं। ऐसा करना बहुत सुफलदायी है, क्योंकि सिदूर उष्ण होता है।
कस्तूरी रंग व ये तिलक लगाना है शुभ फलदायी
शास्त्रों के अनुसार महिलाओं को अपने माथे पर कस्तूरी रंग की बिदी या सिदूर लगाना चाहिए। ऐसा कहा गया है कि श्वेत चंदन, लाल चंदन, कुमकुम, विल्बपत्र, भस्म, आदि का तिलक करना शुभ है। जो भी व्यक्ति बिना तिलक लगाए प्रात: या संध्या का हवन करता है उसे इसका फल नहीं प्राप्त होता।
उर्ध्व पुण्डर और भस्म से त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए
तिलक लगाने का एक और मुख्य नियम यह है कि एक ही व्यक्ति या साधक को उर्ध्व पुण्डर और भस्म से त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए। चंदन से एक ही साधक को उध्र्व पुण्डर तथा भस्म से त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए।
ललाट बिदु क्या है?
माथे के ठीक बीच के हिस्से को ललाट बिदु कहते हैं, यह भौहों का भी मध्य भाग है। तिलक हमेशा इसी स्थान पर धारण किया जाना चाहिए।
भिन्न अंगुली से लगाने का क्या फल?
प्रत्येक उंगली से तिलक लगाने का अपना-अपना महत्व है जैसे मोक्ष की इच्छा रखने वाले को अंगूठे से तिलक लगाना चाहिए, शत्रु नाश करना चाहते हैं तो तर्जनी से, धनवान बनने की इच्छा है तो मध्यमा से और सुख-शान्ति चाहते हैं तो अनामिका से तिलक लगाएं। देवताओं को मध्यमा अंगुली से तिलक लगाया जाता है। उत्तर भारत में तिलक आरती के साथ आदर, सत्कार और स्वागत कर तिलक लगाया जाता है।
तिलक लगाने के लिए भिन्न-भिन्न अंगुलियां का प्रयोग अलग-अलग फल प्रदान करता है।
अनामिका अंगुली से मिलती है शांति
अगर तिलक अनामिका अंगुली से लगाया जाता है तो इससे शांति मिलती है।
मध्यमा अंगुली से बढ़ती है आयु
मध्यमा अंगुली से तिलक करने पर आयु में बढ़ोत्तरी होती है, इसके अलावा अंगूठे से तिलक करना पुष्टिदायक माना गया है।
तांत्रिक क्रियाओं में तर्जनी अंगुली का प्रयोग
विष्णु संहिता में इस बात का उल्लेख है कि किस प्रकार के कार्य में किस अंगुली से तिलक लगाना उचित होता है। किसी भी तरह के शुभ और वैदिक कार्य में अनामिका अंगुली, पितृ कार्य में मध्यमा, ऋषि कार्य में कनिष्ठिका तथा तांत्रिक क्रियाओं में प्रथम यानि तर्जनी अंगुली का प्रयोग किया जाना चाहिए।
तिलक हमेशा बैठकर ही लगाएं
कुछ सामान्य नियम हम आपको बताने जा रहे हैं, जिसका वर्णन पद्म पुराण में वर्णन किया गया है। जिसमें कहा गया है कि तिलक हमेशा बैठकर ही लगाना चाहिए। ललाट के दाहिने भाग में ब्रह्मा, वाम भाग में शिव जी, मध्य भाग में श्री कृष्ण का वास होता है। इसलिए मध्य भाग का अंश खाली रखना चाहिए, ताकि ललाट में विष्णु का वास बना रह सके।
एक नियम यह भी है आराध्य पर चढ़ाने से बचे हुए चंदन से तिलक लगाना चाहिए। पुराण में शिव जी पार्वती को नियम बताते हुए कहते हैं कि वैष्णवों के अंग्रेजी के वी आकार बनाये जाने वाले तिलक के बीच में जो स्थान है, उसमें लक्ष्मी व नारायण का वास होता है।
ब्राह्मण को तिलक लगाने के बाद करें तर्पण व पूजन
ब्राह्मण को तिलक लगाने के बाद ही तर्पण व पूजन आदि करना चाहिए।
यह भी हैं नियम
देवी-देवताओं को अनामिका द्बारा, स्वयं को मध्यमा उंगुली द्बारा, पितृगणों को तर्जनी उंगुली द्बारा व ब्राह्मणों को अंगूठे द्बारा तिलक लगाना चाहिए।



