रामचरितमानस से “सदाचार”के सूत्र

सब करि मांगहि एक फलु राम चरन रति होउ ।
तिन के मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ ।।
काम कोह मद मान न मोहा , लोभ न छोभ न राग न द्रोहां ।
जिन्ह के कपट दम्भ नहि माया, तिन्ह के हृदय बसों रघुराया ।।
सब के प्रिय सबके हितकारी , दुःख सुख सरिस प्रसंसा गारी ।
कहहि सत्य प्रिय वचन बिचारी ,जागत सोवत सरन तुम्हारी ।।
तुम्हहि छाड़ी गति दूसर नाहीं ,राम बसहु तिन्ह के मन माही ।
जननी सम जानहिं पर नारी , धन पराव विष तें विष भारी ।।
जे हरषहिं पर सम्पति देखी , दुखित होहिं प्र विपति विशेषी ।
जिनहि राम तुम प्रानपियारे, तिन के मन सुभसदन तुम्हारे ।।
स्वामि सखा पितु मातु गुरु जिनके सब तुम तात ।
मनमंदिर तिनके बसहु सीय सहित दोउ भ्रात ।।

“प्यारे प्रभु” तब ही प्रसन्न होते हैं जब साधक पूरी श्रद्धा से उनकी चरन वन्दना करते हैं । वह व्यक्ति जो काम क्रोध मद मान मोह लोभ क्षोभ राग द्रोह दम्भ कपट और माया का परित्याग करता है, उसके हृदय में ही “प्रभु” का निवास होता है । जो सबके प्रति प्रेम रखे और सबका हितकारी हो , जो दुःख-सुख , प्रसंशा और बदनामी में सम भाव रहे , सोच विचार कर सत्य और प्रिय वचन बोले ,और एक मात्र प्रभु की शरण में ही रहे ,ऐसे जन के मन में “प्रभु” का निवास होता है । जो पर स्त्री को माँ तथा परधन को “विष” समझे तथा अन्य लोगों की समृद्धि से प्रसन्न हो , जिनका मन दुखियों को देख कर व्यथित हो जाए ,और जो अपने प्रभु से असीम प्रीति करे ऐसे व्यक्तियों के “मन सदन” में “प्रभु” का निवास होता है । ( हम इन प्रभु को “राम नाम” से सम्बोधित करते हैं आप अपने “इष्ट” को सिमर कर इसे पढ़ें – अवश्य कल्याण होगा )

Manish Mundra
Manish Mundra
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