ब्रह्म राम ते नाम बड,बरदायक बरदानि ।
राम चरित सत कोटि मह,लिय महेश जिय जानि ।।
श्री आदिकवि वाल्मीकि जी ने पृथ्वी पर सर्व प्रथम श्री राम चरित को सौ करोड़ श्लोकों में वर्णन किया । जो पृथ्वी पर तीनो लोकों की अमूल्य निधि बनकर तैयार हुई । अब इसके लिए तीनो लोक में झगडा मच गया, आकाश वासी देव, पृथ्वी वासी मानव, और पाताल वासी दानव तीनो इस पर अपना-अपना अधिकार जताने लगे और तीनो भाई आपस में झगड़ गए । देवताओं ने कहा यह श्री राम चरित ग्रन्थ देवभाषा में लिखा गया है और हम सबसे बड़े भाई हैं इसलिए इस पर हमारा अधिकार है । मानवों ने कहा यह श्री रामचरित ग्रन्थ मानव के द्वारा पृथ्वी पर रचा गया है । इसलिए इस पर हमारा अधिकार है । दानवों ने कहा जिसकी लाठी उसकी भैंस , हमारे पास बल है इसलिए ये हमारा है ।
जब कोई भी निर्णय नही हुआ तो तीनो भाई मिलकर महादेव के पास पहुंचे, क्योकि देवताओं को विश्वास था महादेव हमारी जाति के सिरमौर हैं इसलिए निर्णय हमारे पक्ष में ही करेंगे । मनुष्यों को विश्वास था शिव सत्य स्वरुप हैं इसलिए निर्णय हमारे पक्ष में करेंगे । दानवो को विश्वास था हमारे गुरु हैं इसलिए निर्णय हमारे पक्ष में करेंगे ।
परन्तु भगवान् शंकर ने तीनो को संतुष्ट करते हुए इस अमूल्य निधि का बटवारा कर दिया, पहले ३३-३३ करोड़ श्लोक तीनो भाइयों में बाट दिए.बच गया एक करोड़ श्लोक । अब ३३-३३ लाख तीनो भाइयों में पुनः बाट दिए , बच गया एक लाख श्लोक, तब पुनः ३३-३३ हजार श्लोक बाँट दिए, बच गया एक हजार श्लोक, फिर ३-३ सौ श्लोक तीनो भाइयों में बाँट दिए, अब बच गए सौ श्लोक अब ३३-३३ श्लोक तीनो भाइयों में बाँट दिए बच गया एक श्लोक, अनुष्टुप छन्द श्लोक में ३२ अक्षर होते हैं । तो दस-दस अक्षर तीनो भाइयों में बराबर-बराबर बाँट दिए, बच गए दो अक्षर एक र और एक म । इन दोनों को शिव ने अपने ह्रदय में छुपा लिया और तीनो भाइयों को यह कहकर संतुष्ट कर दिया कि मैंने जो इतना श्रम किया है उसके बदले केवल यह दो अक्षर अपने पास रख लिए हैं ।
अर्थात श्री राम चरित में से चेतन जीवनी शक्ति राम-नाम शिव ने अपने पास रख लिया, यही आशय है इस दोहेका ।
निर्गुण रूप सुलभ अति,सगुन जानि नही कोई ।
सुगम अगम नाना चरित,सुनि मुनि मन भ्रम होई ।।
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी,उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी ।
कहों कहाँ लगी नाम बड़ाई,राम न सकहिं नाम गुण गाई ।।
क्योंकि ब्रह्म के दो स्वरूप हैं एक निर्गुण और एक सगुन । हम दोनों में से एक को भी नही समझ पाते । न तो ब्रह्म के निर्गुण स्वरुप को समझ पाते हैं और न ही सगुन रूप को समझ पाते हैं । इसको जानने में बड़े-बड़े ऋषि मुनियों के मन में भी भ्रम हो जाता है । परन्तु श्री राम नाम सबको सहज ही सुलभ है । जिसके व्दारा ब्रह्म के दोनों रूप निर्गुण और सगुन को भली भांत समझ कर उसे पाया जा सकता है । दोनों को जानने और मानने के लिए एक मात्र श्री राम नाम ही सहारा है । अर्थात श्री राम नाम में कितने गुण और कितनी शक्ति है यह स्वयं श्री राम भी वर्णन नही कर सकते हैं ।
तुलसी रा के कहत ही,निकसत पाप पहार.
पुनि आवन पावत नहि,देत किवार मकार.
वर्णमाला में कुल ५२ अक्षर हैं १६ स्वर ३६ व्यंजन १६ स्वरों से बनता है “र” रकार जो अग्नि का बीज है ।जिसके उच्चारण मात्र से सभी पाप भस्म हो जाते हैं । ३६ व्यंजनों से बनता है “म” मकार जो फिर पाप को आने नहीं देता ।



