विजयदशमी “अधर्म पर धर्म की जीत”

विजयदशमी या दशहरा नवरात्रि का 10 वां दिन है और हिन्दुओ के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह अन्याय पर न्याय की, बुराई पर अच्छाई की, अधर्म पर धर्म की जीत है। दंतकथा के अनुसार, इस दिन भगवान राम ने लंका के राजा रावण पर विजय प्राप्त की थी। यह भी कहा जाता है कि इस दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर राक्षस और उसकी पूरी दुष्ट सेना का वध 9 रातों और 10 दिनों तक लड़ने के बाद किया था। दशहरा दोषों पर हमारे गुणों की जीत का ही प्रतीक है। रावण के 10 सिरों के अनुरूप ही 10 दोष हैं जिनसे हमें दशहरे पर लड़ने और जीतने की शिक्षा मिलती है। (1) कामुकता (देह वासना): अनैतिक चरित्र को बढ़ावा देने वाली यह कामुक इच्छा, मनुष्य से किसी जघन्य अपराध को करा सकती है। (2) क्रोध (गुस्सा): जब हम क्रोधित होते हैं तो विवेक बुद्धि समाप्त हो जाती है, जिसके परिणाम स्वरुप कई अपराध और झगड़े होते हैं। क्रोध पर नियंत्रण रखने से भविष्य में होने वाले बहुत सारे पछतावे से बच सकते है। (3) मोह (आकर्षण): इन्द्रिय विषयों पर मोहित मनुष्य का विवेक खो जाता हैं, और मनुष्य पाप के मार्ग पर चलने लगता है। आकर्षण  को नियंत्रण में रखना बेहतर है। (4) लोभ (लालच): जो प्राप्त है वो अपर्याप्त है यही लोभ का मूल कारण होता है, यह लोभ कई शर्मिंदगी और संभावित अपराधों का कारण बनता है और फिर जैसा कि वे कहते हैं, “लालच बुरी बला है”, अपनी भलाई के लिए लालच से लंबी दूरी रखना चाहिए। (5) मद (गर्व की अधिकता): सांसारिक संपत्ति पर गर्व करना व्यर्थता है ये क्षणिक और अस्थायी दोनों है। विनम्र और आडंबरहीन बने रहने के लिए अति अभिमान से बचना चाहिए। (6) मत्सर (ईर्ष्या): यह ईर्ष्या रूपी असुर हमारे तर्क और शांति की भावना को खा जाता है और हमारी समृद्धि और संतुष्टि को हमसे दूर कर देता है। (7) स्वार्थ (आत्महित): स्वार्थ व्यक्ति के मित्र और सम्बन्धीयों को उससे दूर कर देता है। स्वार्थी व्यक्ति होने का परिणाम अंत में वापस मिलता है। (8) अन्याय (बेइंसाफी): अपनी चैतन्यता में हमें हमेशा न्यायपूर्ण होना चाहिए और अनुचित कार्यो का समर्थन नहीं करना चाहिए, फिर चाहे वह समाज से सम्बंधित हो या हमारे निजी जीवन से। (9) अमानवता (क्रूरता): सभी परिस्थितियों में क्रूरता पाप है और इससे बचना चाहिये। दयालु और विनम्र बने, क्रूर लोगों के खिलाफ खड़े होने से हमें अपने जीवन के लिए एक अर्थ मिलेगा। (10) अहंकार (घमंड): रावण का वह दोष जिसने स्वर्णिम लंका का सम्पूर्ण विनाश करा दिया। किसी वस्तु या विषय से स्वयं कि पहचान करना ही अहंकार होता है, वर्तमान में अधिकतर मनुष्य इस दोष से ग्रसित होते है। मिथ्या अहंकार से दूर रहकर हम जीवन में आनंदित हो सकते है। उपरोक्त १० दोषो के विपरीत हमें निम्न इन 10 शक्तियों का पोषण करना चाहिये , (1) साहस: खतरे, चुनौती, कठिनाई या कष्ट से पीछे नहीं हटना; लोकप्रिय नहीं होने पर भी दोषपूर्ण कार्य नहीं करना। (2) दृढ़ता: जो आरम्भ किया है उसे पूर्ण करना; बाधाओं के बावजूद भी क्रियाशील बने रहना। (3) वफ़ादारी: स्वयं को वास्तविक रूप में प्रस्तुत करना; किसी की भावना और कार्यों की जिम्मेदारी लेना। प्रामाणिकता और ईमानदारी का प्रदर्शन। (4) विनय: अपनी उपलब्धियों को अपने लिए बोलने देना; खुद को एक साधारण व्यक्ति से अधिक नहीं मानना । (5) स्व-नियमन: ये व्यक्तिगत प्रबंधन की स्वयं द्वारा निर्धारित एक स्थिति है जिसमें लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए अपने स्वयं के विचारों, व्यवहारों और भावनाओं का मार्गदर्शन करने की प्रक्रिया शामिल है। (6) प्रेम : दूसरों के साथ घनिष्ठ संबंधों को महत्व देना, विशेष रूप से जिसमें आपसी सुख दुःख साझा करना और पारस्परिक देखभाल करना है। (7) दयालुता: दूसरों के लिए उपकार और अच्छे कार्य करना। दूसरों के प्रति उदारता, पोषण, देखभाल, करुणा, परोपकारी प्रेम और अच्छाई के लिए कार्य करना।  दयालुता हमेशा प्रतिफल देती है और जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करना कभी भी व्यर्थ नहीं जाएगा। (8) आशा: भविष्य में सर्वश्रेष्ठ की अपेक्षा करना और उसे प्राप्त करने के लिए निरंतर कार्य करना। (9) क्षमा: जिन्होंने गलत किया है उन्हें क्षमा करना; दूसरों की कमियों को स्वीकार करना; लोगों को दूसरा मौका देना; प्रतिशोधी नहीं होना। (10) बुद्धि: दूसरों को बुद्धिमानी से सलाह देने में सक्षम होना; दुनिया को देखने के ऐसे तरीके होना जो खुद को और दूसरे लोगों के लिए मायने रखते हों। तो, यह दशहरा, रावण के इन दस सिरों के साथ एक युद्ध जीतें और जीवन में समृद्ध और सफल हों।
   
Manish Mundra
Manish Mundra
Articles: 91

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *