कमजोर आत्मा

कमजोर आत्मा का तात्पर्य है ऐसी आत्मा, जो अपने शरीर का मालिक नहीं है बल्कि मन उस शरीर का मालिक है, इस अवस्था में विकार या व्याधि क्रमशः मन या शरीर में प्रवेश कर सकता है, कमजोर आत्मा की स्थिति किसी भय की अवस्था में भी बन जाती है। भय का एक बहुत गहरा अर्थ है। भय का अर्थ है जो सिकोड़ दे। जब आप भयभीत होते हैं, तो आप सिकुड़ जाते हैं। जब आप प्रफुल्लित होते हैं, तो आप फैल जाते हैं। जब कोई व्यक्ति भयभीत होता है, तो उसकी आत्मा सिकुड़ जाती है और उसके शरीर में बहुत जगह छूट जाती है, जहां कोई दूसरी आत्मा प्रवेश कर सकती है। एक नहीं, बहुत आत्माएं भी एकदम से प्रवेश कर सकती हैं। इसलिए भय की स्थिति में कोई आत्मा किसी शरीर में जाती है। और ऐसा करने का कुल कारण इतना होता है कि उसके जो रस हैं, वह शरीर से बंधे हैं। इसलिए वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करके रस लेने की कोशिश करती है। इसका यह मतलब हुआ कि एक तो भयभीत व्यक्ति हमेशा खतरे में है। क्योंकि वह सिकुड़ी हुई हालत में होता है। जैसे डर लगने  पर व्यक्ति अपने को अपने ही मकान में, घर के एक कमरे में खुद को बंद करके सुरक्षित महसूस करता है, लेकिन उसी समय उस मकान के  बाकी कमरे खाली पड़े रहते हैं। बाकी कमरों में दूसरे लोग आकर रह सकते हैं। कभी-कभी श्रेष्ठ आत्माएं भी शरीर में प्रवेश करती हैं लेकिन अधिकतर बुरी आत्माए जिनको अभी तक कोई शरीर नहीं प्राप्त हुआ है वो इन खाली जगहों पर कब्ज़ा जमा लेती है और शरीर के रस का पान करती है जिसके कारण व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रोगी बन जाता है,

जब भी भय लगे तो उसको अवरुद्ध कर दो, भय के कारण बनी खाली जगह को भर देना चाहिये, इसके लिए सबसे उपयुक्त साधन ईश्वर भक्ति है, जब भी भय का अनुभव हो अपने इष्टदेव के भजन कीर्तन सत्संग की मात्रा में वृद्धि कर देनी चाहिये, जिससे खाली जगह में आसुरी शक्ति की जगह दैवीय शक्ति विराजमान हो सके,

Manish Mundra
Manish Mundra
Articles: 91

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *