1) काम– जो नर्क का द्वार कहलाता हैं और मनुष्य का चमड़ी के आकर्षक का दास बनाकर उसकी बुद्धि, पवित्रता और शारीरिक शक्ति हर लेता हैं |
2) क्रोध– यह शांतिरुपी ऊची स्थिति से आत्मा को गिराकर उसे अशांति दुखी और रोगी बनता हैं | क्रोधी व्यक्ति एकाग्रता, स्मृति, विवेक, निर्णयशक्ति, सहनशीलता नम्रता, कर्तव्य परायणता जेसे महान गुणों को नष्ट कर देता हैं |
3) लोभ– लोभी व्यक्ति सोने-जागने बस पदार्थो और धन के संग्रह के ही सपने देखते हैं, उसके लिए वह अपराध करने से भी नहीं हिचकाता, लोभी का मन स्थिति सदा कंगाल रहती हैं इसलिए वह तृप्ति का सुख नही ले पाता |
4) मोह– मनुष्य अकसर किसी व्यक्ति व वस्तु के मोह में अंधा होकर कइयो के हक मार लेता हैं और उसी मोह के वशीभुत अकर्तव्य कार्य करता हैं उसकी सही-गलत की समझ भी नष्ट हो जाती हैं
5) अहंकार – अपने को हर बात में आगे रखने और दिखावा करने के कारण मानव जानते हुए भी ठीक बात का अनुसरण नहीं कर पाता |
6) हठ– जिद्दी व्यक्ति अपनी जिद को प्रतिष्ठा का सवाल बना लेता हैं और उसे पूरा करने के लिए अनैतिकता की हद तक चला जाता हैं |
7) बदले की भावना – उसमे स्वयं को न बदल कर दूसरे के प्रति मन मै बैर एवं अशुभ भावना पालती हैं व चैन सदा के लिए उड़ जाती हैं |
8) कपट – जो व्यक्ति अंदर जहर रखकर मुख पर अमृत का लेप करके चलता हैं उसके अपने भी पराए बन जाते है | और अनतः वह सबका विश्वास और सहानभूति खोकर नितांत अकेला पड़ जाता हैं |
9) क्रूरता – जो दूसरो को तड़पाकर रुलाकर सताकर आनंद लेता है उसे हैवान का दर्जा मिलता है और वह सभी की नफरत का पात्र बन जाता है
10) कलह – शंका, अनुमान, दोशारोषण, परचिन्तन, तेरा-मेरा, झूठ, कामचोरी, व्यसन आदि के कारण काम बिगड़ता हैं, संबंध बिगड़ते हैं, मन के कलेश उत्पन होता हैं, और आसपास का वातावरण भारी हो जाता है, अतः हमे उन सभी बातों से दूर रहना चाहिए |



