योग का मार्ग
अधिकांश योग साधक जानते हैं कि योग शब्द का अर्थ होता है जोड़ना या मिलाना, जिसे अंग्रेजी में “यूनियन” भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में योग पथ की प्रणाली, वियोग या विभाजन की एक प्रक्रिया से बनी है। यह विरोधाभास लग सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। इसका अर्थ है कि योगाभ्यास के माध्यम से व्यक्ति को स्वयं के मन और शरीर से जागरूकता के साथ अलग होना चाहिए। मन और शरीर के आयाम के बीच एक अंतर, जागरूकता के साथ अनुभव होना चाहिए। केवल जब यह अलगाव या भिन्नता व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया जाता है तो कोई इसके पीछे की सच्चाई को जान सकता है और जब द्रष्टा और दृश्य के बीच यह अलगाव होता है, तब व्यक्ति स्वयं को और जीवन को एक नए और उच्च अवस्था से समझेगा। एक नविन अनुभूति का उद्भव होगा। यह पृथक्करण योग की परिणति और एकात्मकता की ओर पहला कदम है।
इसलिए अपने योग अभ्यास में कुछ पाने की सभी अवधारणाओं को भूल जाओ – सभी तार्किक व्याख्याएं और समझ अपूर्ण हैं। केवल वियोग की अनुभूति करें। मन और शरीर को अपनी पहचान से जागरूकता के साथ अलग करना यही योग के सभी पथों का उद्देश्य है । उस योग (वियोग) को खोजो, जो योग (संयोजन) की ओर ले जाए। पुरुष को प्रकृति से अलग करें, ताकि वे उस परमानन्द स्थिति पर संयुक्त हो सकें, जिसकी समस्त योगी अपनी ध्यानावस्था में अनुभूति करते है।
योग साधनाओं का सार वास्तव में वियोग है, संयोजन नहीं। पृथक्करण उसकी विधि है, संयुक्त होना परिणाम है। तो जागरूक रहें; आप जो कुछ भी करते हैं उसके प्रति सचेत रहें। सभी विचारों और कार्यों के साक्षी बनें। अपनी जागरूकता को अन्य सभी घटनाओं से अलग करें। यह आसान नहीं है, लेकिन प्रयास करते रहे ।
हरि ॐ तत सत



