राम गीता

रामचरितमानस’ के ‘अरण्यकाण्ड’ में, लक्ष्मण जी ने, श्री राम से विनम्रतापूर्वक पांच प्रश्नं पूछे।

लक्ष्माण जी की जिज्ञासा को शांत करने के लिए, श्रीराम ने “राम गीता” सुनाई। प्रभु ने सूत्रात्म्क भाषा में,माया, ज्ञान, वैराग्य, जीव-शिव और भक्ति का निरूपण किया है। “राम गीता” में परमात्मा श्रीराम का, गुरु-रूप में दर्शन होता है।

  • ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।
    जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥

भावार्थ:-हे प्रभो! ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जाएँ॥

  • थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥
    मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥

भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे तात! मैं थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो! मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है॥

  • गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥
    तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥

भावार्थ:-इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो-॥

  • एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥
    एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥

भावार्थ:-एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यंत दुःखरूप है, जिसके वश होकर जीव संसार रूपी कुएँ में पड़ा हुआ है और एक (विद्या) जिसके वश में गुण है और जो जगत्‌ की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नही है॥

  • ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥
    कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥

भावार्थ:-ज्ञान वह है, जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी (दोष) नहीं है और जो सबसे समान रूप से ब्रह्म को देखता है। हे तात! उसी को परम वैराग्यवान्‌ कहना चाहिए, जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो॥4॥

(जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्य सेवा का अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मन का निगृहीत न होना, इंद्रियों के विषय में आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिमय जगत्‌ में सुख-बुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदि में आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में हर्ष-शोक, भक्ति का अभाव, एकान्त में मन न लगना, विषयी मनुष्यों के संग में प्रेम- ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म (आत्मा) में स्थिति तथा तत्त्व ज्ञान के अर्थ (तत्त्वज्ञान के द्वारा जानने योग्य) परमात्मा का नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है। देखिए गीता अध्याय 13/ 7 से 11)

  • माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
    बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥

भावार्थ:-जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिए। जो (कर्मानुसार) बंधन और मोक्ष देने वाला, सबसे परे और माया का प्रेरक है, वह ईश्वर है॥

  • धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥
    जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥

भावार्थ:-धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देने वाला है- ऐसा वेदों ने वर्णन किया है। और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देने वाली है॥

  • सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
    भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥

भावार्थ:-वह भक्ति स्वतंत्र है, उसको (ज्ञान-विज्ञान आदि किसी) दूसरे साधन का सहारा (अपेक्षा) नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है और वह तभी मिलती है, जब संत अनुकूल (प्रसन्न) होते हैं॥

  • भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥
    प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥

भावार्थ:-अब मैं भक्ति के साधन विस्तार से कहता हूँ- यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणों के चरणों में अत्यंत प्रीति हो और वेद की रीति के अनुसार अपने-अपने (वर्णाश्रम के) कर्मों में लगा रहे॥

  • एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥
    श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥

भावार्थ:-इसका फल, फिर विषयों से वैराग्य होगा। तब (वैराग्य होने पर) मेरे धर्म (भागवत धर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मन में मेरी लीलाओं के प्रति अत्यंत प्रेम होगा॥

  • संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥
    गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥

भावार्थ:-जिसका संतों के चरणकमलों में अत्यंत प्रेम हो, मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो,॥

  • मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥
    काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥

भावार्थ:-मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ॥

  • बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।
    तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥

भावार्थ:-जिनको कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ॥

  • भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥
    एहि बिधि कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥

भावार्थ:-इस भक्ति योग को सुनकर लक्ष्मणजी ने अत्यंत सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्री रामचंद्रजी के चरणों में सिर नवाया। इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गए॥

Manish Mundra
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