श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह एक प्रार्थना है। जिसमें तीन श्लोक सम्मलित हैं। इसमें व्यक्ति के मन (मनस), भाषण (वाणी) और शरीर (काया) को सर्वोच्च आत्मा को समर्पित करने की प्रार्थना की जाती है।
प्रतिदिन के पहले विचार, शब्द और कार्य व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। यदि इन्हें ईश्वर को समर्पित किया जाता है तो ये दिव्य बन जाते है, और वे आध्यात्मिक प्रकाश का मार्ग प्रशस्त करते है। प्रातःकाल का समय आंतरिक जागरण का बाहरी प्रतीक है इसलिए प्रातःकाल की प्रार्थना बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
इन छंदों में, शंकराचार्य अद्वैत-वेदांत की सर्वोत्कृष्टता भी बताते हैं। परम सत्य “सच्चिदानंद” (अस्तित्व-चेतना-आनंद) है। यह तुरीय है, जो अनुभव की तीन अवस्थाओं की वास्तविकता है ये उनसे भी परे है।
हालाँकि, इन अभिव्यक्तियों को शाब्दिक रूप से वर्णनात्मक या वास्तविकता के निश्चित के रूप में नहीं कहा जा सकता है । यह इसलिए कहा गया है, क्युकी ब्रह्म को नकारात्मक तरीके से इंगित किया जाता है, जैसे ‘नेति नेति, ‘यह नहीं’। “ब्रह्म” वर्गीकरण से परे है; यह विचारों और शब्दों की सीमा के भीतर नहीं है। तथाकथित व्यक्तिगत आत्मा इससे भिन्न नहीं है। “आत्मा” को शरीर और मन की विविधताओं के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिये।
जो तत्व संसार का निर्माण करते हैं, वे मूल वास्तविकता पर भ्रमपूर्ण आभास हैं, जैसे एक रस्सी में सर्प या माला होने का भ्रम हो जाता है, फिर जैसे ही ज्ञान का सूर्य उदय होता है, ये भ्रम गायब हो जाते हैं और जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है।
प्रातः स्मरण – स्तोत्रम
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥१॥
Prátah smarámi hrudi samsphuradátmatattvam
saccitsukham paramahamsagatim turèyam
yatsvapna jágarasussuptamavaiti nityam
tadbrahma niskalamaham na cha bhutasañgha.
प्रातःकाल हम उस अस्तित्व को स्मरण करते है, जो आत्मा है, जो ह्रदय में प्रभावी रूप से प्रकाशित हो रही है, अस्तित्व-चेतना-आनदं, परमहंसन्यासियों (ऋषि) का लक्ष्य, वह चौथा स्तर ; जो सदा स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति की अवस्थाओं को जानता है, वह ब्रह्म जो अखण्ड है, जो तत्त्वों के समूह से परे है ।
प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं
वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण ।
यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचं_
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम् ॥२॥
Pratarbhajámi manasá vacasámagamyam
vacho vibhánti nikhilá yadanugrahena
yanneti neti vacanair nigamá avocam-
stam devadevamajam achyutam áhur agryam.
प्रातःकाल हम उसकी स्तुति करते है, जो मन और वाणी से अप्राप्य है, लेकिन जिसकी कृपा से सभी शब्द बनते हैं। जिसे शास्त्र ‘नेति नेति’ (यह नहीं) शब्दों के माध्यम से घोषित करते हैं – वे कहते हैं कि ईश्वरो का ईश्वर अजन्मा और अपरिवर्तनीय है।
प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्णं
पूर्णं सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम् ।
यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्तौ
रज्ज्वां भुजङ्गम इव प्रतिभासितं वै ॥३॥
Prátarnamami tamasah paramarkavarnam
pürnam sanátanapadam purushottamaakhyam
yasminnidam jagadaseshamaseshamurtau
rajjvaam bhujamgama iva pratibhasitam vai.
हम प्रातःकाल उस सर्वोच्च आत्मा को नमन करते है, जो अंधकार से परे है, सूर्य के रंग का प्रतिक है, प्राचीन लक्ष्य जो तत्त्वपूर्ण है , वह अवशेष रहित रूप है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकट होता है, जैसे किसी रस्सी में सांप होने का बोध होता है ।
श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् ।
प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥४॥
Slokatrayamidam punyam lokatrayavibhusanam
pratahkale pathedyastu sa gacchetparamam padam.
छंदों की यह गुणोत्कृष्ट त्रय, तीन शब्दों का अलंकार – जो प्रातःकाल वाचन करता है वह सर्वोच्च लक्ष्यों को प्राप्त होता है। यह इस वेदांतिक प्रार्थना की फल स्तुति है। यह उस प्रार्थना की स्तुति है जिसका उद्देश्य व्यक्ति के विचारों, शब्दों और कर्मों को पवित्र करना है ताकि जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।



