सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण ही इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं। किस प्रकार ? –
अर्जुन ! उन तीनों गुणों में प्रकाश करनेवाले निर्विकार सत्त्वगुण तो ‘निर्मलत्वात्’ – निर्मल होने के कारण सुख और ज्ञान की आसक्ति से आत्मा को शरीर में बाँधता है। सत्त्वगुण भी बंधन ही है। अंतर इतना ही है कि सुख एकमात्र परमात्मा में है और ज्ञान साक्षात्कार का नाम है। सत्त्वगुणी तब तक बँधा है, जब तक परमात्मा का साक्षात्कार नहीं हो जाता।
हे अर्जुन ! राग का जीता – जागता स्वरूप रजोगुण है। उसे तू ‘कर्मसंगेन’ – कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान। वह जीवात्मा को कर्म और उसके फल की आसक्ति में बाँधता है। वह कर्म में प्रवृत्ति देता है।
अर्जुन ! समस्त देहधारियोँ को मोहनेवाले तमोगुण को तू अज्ञान से उत्पन्न हुआ जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद अर्थात् व्यर्थ की चेष्टा, आलस्य (कि कल करेंगे) और निद्रा के द्वारा बाँधता है। निद्रा का अर्थ यह नहीं है कि तमोगुणी अधिक सोता है। शरीर सोता हो ऐसी बात नहीं। ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। ‘ जगत् ही रात्रि है। तमोगुणी व्यक्ति इस जगत् रूपी निशा में रात – दिन व्यस्त रहता है, प्रकाश स्वरूप की ओर अचेत रहता है। यही तमोगुणी निद्रा है। जो इसमें फँसा है, सोता है। अब तीनों गुणों के बंधन का सामूहिक स्वरूप बताते हैं –
अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, शाश्वत परमसुख की धारा में लगाता है, रजोगुण कर्म में प्रवृत्त करता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित करके प्रमाद में अर्थात् अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओँ में लगाता है। जब गुण एक ही स्थान पर एक ही हृदय में हैं, तो अलग – अलग कैसे विभक्त हो जाते हैं ? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं –
हे अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, वैसे ही सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है तथा इसी प्रकार रजोगुण और सत्त्वगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है। यह कैसे पहचाना जाय कि कब और कौन – सा गुण कार्य कर रहा है?-
जिस काल में इस शरीर तथा अंतःकरण और संपूर्ण इन्द्रियोँ में ईश्वरीय प्रकाश और बोधशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण विशेष वृद्धि को प्राप्त हुआ है। तथा –
हे अर्जुन ! रजोगुण की विशेष वृद्धि होने पर लोभ, कार्य में प्रवृत्त होने की चेष्टा, कर्मों का आरंभ, अशांति अर्थात् मन की चंचलता, विषय – भोगोँ की लालसा – यह सब उत्पन्न होते हैं। अब तमोगुण की वृद्धि में क्या होता है? –
अर्जुन ! तमोगुण के बढ़ने पर ‘अप्रकाश:’ – ( प्रकाश परमात्मा का द्योतक है) ईश्वरीय प्रकाश की ओर न बढ़ने का स्वभाव, ‘ कार्यम् कर्म’ – जो करने योग्य प्रक्रिया – विशेष है उसमें अप्रवृत्ति, अंतःकरण में व्यर्थ चेष्टाओँ का प्रवाह और संसार में मुग्ध करनेवाली प्रवृत्तियाँ – यह सभी उत्पन्न होते हैं। इन गुणों की जानकारी से लाभ क्या है? –
जब यह जीवात्मा सत्त्वगुण की वृद्धिकाल में मृत्यु को प्राप्त होता है, शरीर – त्याग करता है, तब उत्तम कर्म करनेवालोँ के मलरहित दिव्य लोकोँ को प्राप्त होता है। तथा
रजोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होनेवाला कर्मों की आसक्तिवाले मनुष्यों में जन्म लेता है तथा तमोगुण की वृद्धि में मरा हुआ पुरुष मूढ़ योनियोँ में जन्म लेता है, जिसमें कीट – पतंगादिपर्यन्त योनियोँ का विस्तार है। अतः गुणों में भी मनुष्यों को सात्त्विक गुणोंवाला होना चाहिये। प्रकृति का यह बैंक आपके अर्जित गुणों को मृत्यु के उपरांत भी उन्हें आपको सुरक्षित लौटाता है। अब देखें इसका परिणाम –
सात्त्विक कर्म का फल सात्त्विक, निर्मल, सुख, ज्ञान और वैराग्यादि कहा गया है। राजस कर्म का फल दुःख और तामस कर्म का फल अज्ञान है। तथा –
सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है (ईश्वरीय अनुभूति का नाम ज्ञान है) , ईश्वरीय अनुभूति का प्रवाह होता है। रजोगुण से निःसंदेह लोभ उत्पन्न होता है तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह, आलस्य (अज्ञान) ही उत्पन्न होता है। ये उत्पन्न होकर कौन – सी गति देते हैं? –
सत्त्वगुण में स्थित हुआ पुरुष ‘ऊर्ध्वमूलम्’ – उस मूल परमात्मा की ओर प्रवाहित होता है, निर्मल लोकोँ को जाता है। रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्यम श्रेणी के मनुष्य होते हैं, जिनके पास न ‘सात्त्विकं’ – विवेक – वैराग्य ही होता है और न अधम कीट – पतंग योनियोँ में जाते हैं बल्कि पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं और निंदित तमोगुण में प्रवृत्त हुए तामस पुरुष ‘अधोगतिः’ अर्थात् पशु – पक्षी, कीट – पतंगादि अधम योनियोँ को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों गुण किसी – न – किसी रूप में योनि के ही कारण हैं। जो पुरुष गुणों को पार कर लेते हैं, वे जन्म – बंधन से छूट जाते हैं और मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं। इस पर कहते हैं-
जिस काल में द्रष्टा आत्मा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यंत परे परमत्त्व को ‘वेत्ति’ – विदित कर लेता है, उस समय वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। यह बौद्धिक मान्यता नहीं है कि गुण गुण में बरतते हैं। साधन करते – करते एक ऐसी अवस्था आती है, जहाँ उस परम से अनुभूति होती है कि गुणों के सिवाय कोई कर्त्ता नहीं दिखता, उस समय पुरुष तीनों गुणों से अतीत हो जाता है। यह कल्पित मान्यता नहीं है। इसी पर आगे कहते हैं-
पुरुष इन स्थूल शरीरोँ की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म – मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से विशेष रूप से मुक्त होकर अमृततत्त्व का पान करता है।



